जलियांवाला बाग बन गया था हापुड़ का अतरपुरा चौपला, शांतिपूर्ण ढंग से तिरंगा फहराने जा रहे नगरवासियों पर तत्कालीन कोतवाल ने चलवाई थी गोलियां, एक युवती सहित पांच लोग हो गए थे शहीद

जलियांवाला बाग बन गया था हापुड़ का अतरपुरा चौपला, शांतिपूर्ण ढंग से तिरंगा फहराने जा रहे नगरवासियों पर तत्कालीन कोतवाल ने चलवाई थी गोलियां, एक युवती सहित पांच लोग हो गए थे शहीद
यथार्थ अग्रवाल मुन्ना
हापुड़।
अंधा चकाचौंध का मारा, क्या जाने इतिहास बेचारा। साखी हैं उनकी महिमा के सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल। कलम, आज उनकी जय बोल। रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता उन शहीदों की याद दिलाती है, जिन्होंने देश को आजादी दिलाने में अपना बलिदान दे दिया। देश में जब भी आजादी की बात होती है तो उसमें हापुड़ का भी जिक्र होता है। 9 अगस्त 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन की घोषणा के बाद देशभर में प्रदर्शन शुरू हो गए थे। 10 अगस्त को गांधी जी के आह्वान पर हापुड़ के स्वतंत्रता सेनानियों ने 11 अगस्त को नगर पालिका में तिरंगा फहराने का निर्णय लिया था।
इस दौरान शहर के चारों कोनों से लोगों ने जुलूस निकाला और अतरपुर चौपला पर इकट्ठे हो गए। जुलूस का नेतृत्व कैलाश चंद, महेश, लाला बखतावर लाल, मुकुट लाल संपादक और अमोलक चंद कर रहे थे। 11 अगस्त की सुबह अंग्रेजों के खिलाफ हुंकार भर रहे सैकड़ों लोगों को देख तत्कालीन कोतवाल कय्यूम ने जनरल डायर की तर्ज पर अतरपुरा चौपला पर शांतिपूर्ण ढंग से जुलूस निकाल रहे निहत्थे लोगों को घेरकर लाठीचार्ज और उनपर गोलियां बरसा दी थीं। इस दौरान एक युवती सहित पांच वीर शहीद हो गए थे। उन्हीं की याद में हर साल 11 अगस्त को शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि दी जाती है।
तीन गोली लगने के बाद भी गिरने नहीं दिया तिरंगा…
जनरल डायर की फायरिंग में गिरधारी लाल, राम स्वरूप, अंगनलाल और मांगे लाल गोली लगने से शहीद हो गए, लेकिन सेवकराम ने 3 गोली लगने के बाद भी तिरंगा नहीं गिरने दिया और अंग्रेजों से लड़ते हुए उन्होंने नगर पालिका में पहुंचकर तिरंगा लहरा दिया था। वहीं, 12 अगस्त 1942 को सफाई के दौरान अतरपुरा चौपले पर 12 वर्षीय एक बच्ची का गोली लगा शव मिला था, जिसका आज तक कुछ पता नहीं चल सका। कोतवाल के इस कांड को मिनी जलियांवाला बाग का नाम भी दिया जाने लगा था। आजादी के बाद 1947 से कुछ गणमान्य लोगों ने यहां पर शहीदों की शहीद स्मारक बना दी और तब से आज तक प्रतिवर्ष 11 अगस्त को शहर के लोग शहीदों को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
शहीद स्मारक पर बनी पुलिस चौकी
वहीं, दूसरी ओर शहीद स्मारक पर कई दशकों से रेलवे रोड पुलिस चौकी बनाकर पुलिसवालों ने अपना कब्जा कर रखा है। हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद भी आजतक जगह खाली नहीं हो सकी है।
1942 में बनी शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष सुरेश चंद संपादक ने बताया कि समिति की बैठक में तय किया गया है कि उक्त जगह पर पुलिस चौकी, शहीद स्तंभ, संग्राहलय और पीड़ित दुकानदारों को दुकानें नए सिरे से बनाकर दी जाएंगी।
उन्होंने बताया कि इस मामले में तत्कालीन डीएम अभिषेक पाण्डेय ने शहीदों के प्रति सम्मान दिखाते हुए शहीद स्मारक की रूपरेखा बनवानी शुरू कर दी थी , यदि सबकुछ ठीक ठाक रहा,तो जल्द ही यहां पर भव्य शहीद स्मारक स्थापित होगा।















