देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले हापुड़ सहित देश के क्रान्तिकारियों को श्रद्धांजलि देते हुए शहीद मेलें का किया गया शुभारंभ, हापुड़ के सैकड़ों देशभक्तों ने दी थी अपनी कुर्बानी, रामलीला मैदान का वृक्ष है साक्षी

हापुड़ (यर्थाथ अग्रवाल मुन्ना)।
देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालें हापुड़ सहित देश के लाखों देशभक्तों की शहादत को श्रद्धांजलि देते हुए देश के पहले शहीद मेलें का शुभारंभ किया गया।
स्वाधीनता संग्राम शहीद स्मारक समिति के तत्वावधान में शहर के दिल्ली रोड स्थित रामलीला मैदान में शहीद मेला व प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। सदर विधायक विजयपाल आढ़ती ने मेले का शुभारंभ कर शहीदों को नमन किया और उनके जीवन पर प्रकाश डाला।
इस मौके पर समिति अध्यक्ष ललित अग्रवाल, कोषाध्यक्ष आशुतोष आजाद, महामंत्री मुकुल त्यागी, विशाल अग्रवाल एडवोकेट, अभिलाष सिंह एडवोकेट, राजीव गर्ग, संजय गर्ग, प्रभात अग्रवाल, दानिश खान, सत्यप्रकाश गर्ग सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
जिस धरती ने आजादी की जंग में अपना खून बहाया उन शहीदों को याद करने के लिए हापुड़ में हर साल मेले का आयोजन किया जाता है। परंतु जिन्होंने देश को आजादी दिलाई उनके नाम पर लगने वाले मेले को शासन स्तर से कोई अनुदान नहीं मिलता है। उद्घाटन के समय केवल आश्वासन पर एक साल के लिए कुर्बानी बार बार छिप जाती है।
हापुड़ शहर की हवाओं में तैरती हैं 1857 की लाखों कहानियां
मेरठ से शुरू हुई 1857 की इस क्रांति में शहर हापुड़ का जिक्र करना बेहद जरूरी है, क्योंकि इस क्रांति में हापुड से ग्रामीणों ने बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों का साथ दिया था। इस शहर पर एक नजर डालें तो यूपी के इस शहर का नाम हापुड़ ‘हापर’ शब्द से बना है जिसका मतलब बगीचा होता है। इस शहर की हवाओं में घूमती 1857 की लाखों कहानियां यहाँ के वीर शहीदों, क्रांतिकारियों और देशभक्ति से लबालब लोगों की याद दिलाती हैं जिन्होंने 1857 की क्रांति में अपने प्राणों की आहुति दी थी।
मेले संस्थापक स्वर्गीय कैलाश चंद आजाद के बेटे आशुतोष आजाद ने बताया कि उनके पिता ने 1975 में यहां छोटा सा पौधा रोपा था, जो अब बटवृक्ष है। यह देश में लगने वाला एकमात्र शहीद मेला है। उन्होंने बताया कि मेरठ के कालीपलटन मंदिर से 10 मई 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई गई। इस दौरान महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, भगत सिंह, सुभाष चंद बोस समेत कई क्रांतिकारी आजादी का बिगुल फूंक रहे थे। उस समय हापुड़ क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा था, यहां अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए छुपकर रणनीति बनाई जाती थी। अंग्रेजों ने विद्रोह करने के कारण हापुड़ के 26 गांवों के गुर्जरों और अन्य लोगों के पैरों में कील गाढ़कर जिंदा जला दिया था। वहीं, कुछ क्रांतिकारियों को पेड़ों से बांधकर गोली से उड़ा दिया था, जिन पेड़ों पर उन्हें फांसी दी गई, आज वही उनकी शहादत की याद दिलाते हैं। उन्हीं की याद में 1975 में स्वतंत्रता सैनानी रहे आचार्य कैलाश आजाद ने देश के पहले शहीद मेले का शुभारंभ किया था।
शहीदों के मेले की अनदेखी—
देश में शहीदों का नाम पर हापुड़ में एक माह तक लगने वाले मेले को लेकर जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी तंत्र की अनदेखी के चलते आज तक कोई शासन से अनुदान नहीं मिल पाया है। परंतु शासकीय उपेक्षाओं के चलते नौचंदी की तरह लगने वाला मेला आज तक नौचंदी की तर्ज पर नहीं लग पाया है।
अतिक्रमण में घिर गए स्मारक–
जिन बेटों ने कुर्बानी दी उनकी याद संजोए खड़े स्मारक पर कोई ध्यान नहीं हैा। रामलीला ग्राउंड के बाहर स्मारक के चारों ओर ठेले खड़े कर लिए जाते हैं।











