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ब्राह्मण महासभा का आयोजन, भगवान परशुराम जयंती मनाने को लेकर हुई चर्चा

ब्राह्मण महासभा का आयोजन,
भगवान परशुराम जयंती मनाने को लेकर हुई चर्चा

हापुड़। नगर के आर के प्लाजा में ब्राह्मण महासभा का आयोजन किया गया था जिनमें
श्री भगवान परशुराम जयंती कैसे मनाई जाए उनकी तैयारी को लेकर विस्तार रूप से चर्चा किया गया झांकियां के बारे में चर्चा गया सुरक्षा के बारे में चर्चा किया गया शहर में शांति रूप से कैसे झांकियां निकले उसे विषय पर चर्चा किया गया ।

महासभा के प्रदेश अध्यक्ष ज्योतिर्विद पंडित सुबोध पाण्डेय ने अपने संबोधन में महासभा को बताया कि हमारी महासभा ने कुछ विशेष तैयारी कर रखा हैं यह एक महत्वपूर्ण कदम है। जो महासभा को मजबूती प्रदान करेगा । महासभा के आगे के होने वाले कार्यों की भूमिका बनाया गया। महासभा सभा को और आगे ले जाने के लिए हर संभव प्रयास करता रहूंगा।

प्रदेशाध्यक्ष ज्योतिर्विद पंडित सुबोध पाण्डेय ने बताया
भगवान परशुराम महाविष्णु के छठे अवतार हैं और साथ‑साथ ब्राह्मण‑क्षत्रिय के बीच अधर्म के विरुद्ध कार्य करने वाले “ब्रह्म‑क्षत्र अवतार” माने जाते हैं। वे चिरंजीवी माने गए हैं, यानी कल्प के अंत तक पृथ्वी पर रहने वाले देव‑मानव स्वरूप हैं,जो आज भी महेंद्रगिरि आदि पर ही तपस्या करते माने जाते हैं।

परशुराम का जन्म सागर तट के पास जमदग्नि मुनि के आश्रम में रेणुका जी के गर्भ से हुआ। उन्हें “भार्गव” (जमदग्नि के पुत्र) और “राम” भी कहा जाता है, जबकि “परशुराम” नाम उनके मुख्य शस्त्र―फरसा (परशु) के कारण पड़ा।
क्षत्रियों का विनाश और कार्य
परशुराम का मुख्य कार्य पृथ्वी से दुष्ट और अधर्मी क्षत्रियों का विनाश कर धरती का “भार” हल्का करना था। जब कार्तवीर्य अर्जुन और उसके क्षत्रियों ने जमदग्नि का अपमान व वध कर दिया, तो परशुराम ने क्रोध में आकर कहा जाता है कि उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन करके रक्त से झीलें भर दीं।
परशुराम का प्रमुख शस्त्र “परशु” (फरसा) था, जो भगवान शिव द्वारा दिया गया दिव्य अस्त्र माना जाता है। वे महान योद्धा और अस्त्र‑शस्त्र के आचार्य भी थे, जिनके शिष्यों में कर्ण, भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख क्षत्रिय योद्धा शामिल हैं।
पुराणों के अनुसार परशुराम चारों युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) में प्रकट हुए हैं।
त्रेता में जानकी स्वयंवर में श्रीराम के अभिनंदनकर्ता, द्वापर में श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र देने वाले और कलियुग में महेंद्रगिरि पर तपस्या करते रहने वाले उन्हें बताया गया है।
धार्मिक और सामाजिक महत्व
परशुराम को न केवल ब्राह्मणों के रक्षक बल्कि संपूर्ण हिन्दू समाज के आदर्श रूप में पूजा जाते हैं। उनकी जयंती वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को मनाई जाती है, जब उनके चरित्र, ब्रह्मचर्य, तपस्या और अधर्म‑निग्रह की शिक्षा को याद किया जाता है।



श्री सनातन ज्योतिष कर्मकांड महासभा की ओर से
प्रदेश अध्यक्ष ज्योर्तिवेदन पंडित सुबोध पाण्डेय
संस्थापक प्रेम प्रकाश मिश्रा
राष्ट्रीय अध्यक्ष दुर्गेश शास्त्री
मनोज मिश्रा इस सभा में उपस्थित रहे।















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