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सन् 1942 के आंदोलन के दौरान असौड़ा आए थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

हापुड़। महात्मा गांधी ने 1935 में हापुड़ पहुंचकर स्वतंत्रता सेनानियों की मीटिंग के बाद अंग्रेजों का भगाने का मंत्र दिया था। जबकि 1942 में हापुड़ और गढ़मुक्तेश्वर में पहुंचकर लोगों के साथ मीटिंग की थी। महात्मा गांधी ने असौड़ा के महल में बैठक की थी, जिसकी दुर्लभ तस्वीर आज तक भी रियासत वाले परिवार ने संभाल रखी हैं।

1935 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हापुड़ की गांधी विहार कालोनी में आए थे। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता सेनानियों की मीटिंग लेकर उनको आजादी का मंत्र दिया था। शहर के बुजुर्गों का कहना है कि महात्मा गांधी मेरठ की हापुड़ तहसील से भलीभाति परिचित थे। क्योंकि 1857 में स्वतंत्रता की चिंगारी में हापुड़ के सपूतों का काफी योगदान रहा था। इसके अलावा राष्ट्रपिता महात्मा गांधीा भारत छोड़ों आंदोलन की अलख जगाने के लिए देश में घूम रहे थे। 1935 में वे हापुड़ पहुंचे थे। जहां पर उन्होंने एक स्थान पर जाकर स्वतंत्रता सेनानियों से मंत्रणा की थी। आशुतोष आजाद का कहना है कि जिस स्थान पर महात्मा गांधी आए थे उसको आज गांधी विहार कालोनी के नाम से पुकारा जाता है।

असहयोग आंदोलन की हापुड़ से हुई शुरूआत

असौड़ा गांव का आजादी की लड़ाई में काफी योगदान रहा है। महात्मा गांधी के लिए असहयोग आंदोलन की शुरूआत असौड़ा गांव से शुरू हुई थी जो फफंदा आदि गांवों से निकते हुए मेरठ और गाजियाबाद पहुंची थी। लोनी में नमक के पैकेट बांटे गए थे। मेरठ में खादी की टोपी और खादी का प्रयोग करने के लिए भाषण पर रघुवीर नारायण के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जेल भेज दिया गया था। 16 अप्रैल 1930 में असहयोग आंदोलन के लिए असौड़ा से सत्याग्रह जत्था निकला था जो खरखौदा, फफूंडा आदि गांवों से होता हुआ मेरठ पहंुंचा। इसके बाद मेरठ से लोनी पहुंच गया जहां पर नमक के पैकेट दिए गए थे। जिसको आम जनता ने बहुत पसंद किया गया था। रात को गाजियाबाद में उनका जत्था ठहर गया था।

महात्मा गांधी का था आना जाना

महात्मा गांधी 1942 के आंदोलन का मेरठ से अगुवाई करने के लिए असौड़ा आए थे। असौड़ा रियासत में महात्मा गांधी ने आकर अपना भाषण दिया था। महात्मा गांधी यहां आया जाया करते थे। 1942 में महात्मा गांधी तथा मोतीलाल नेहरू का कार्यक्रम गढ़मुक्तेश्वर में तय कर दिया गया था। जिसमें मोतीलाल नेहरू तथा महात्मा गांधी रेल से गढ़ पहुंचे थे। रेलवे स्टेशन के पास ही उनकी सभा रखी गई थी। भारत छोड़ों आंदोलन को लेकर हुए कार्यक्रम में रघुवीर नारायण ने अतर सिंह को जिम्मेदारी सौंप दी थी। जिन्होंने इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर लौटे चौ0 बलजीत सिंह महलवाला वालों को खाने पीने की जिम्मेदारी दी गई थी। अतर सिंह समेत अन्य लोगों ने एक गोपनीय रणनीति तय की थी।


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