प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख की जयंती समारोह आयोजित

हापुड़ । महिला जागृति फाउंडेशन ने भारत की प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख की जयंती समारोह ग्राम मुरादपुर पटना जिला हापुड़ में सभी ग्राम वासियों के साथ सहयोग से संपन्न हुआ।
मुख्य अतिथि डॉ नीलम सिंह और डॉ नीलम सागर थी।
महिला जागृति फाउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्षा गीता पैट्रिक ने अपने संबोधन में कहा कि जीवन में याद रखना नारी कभी हारती नहीं उसे हराया जाता है, लोग क्या कहेंगे ये कहकर बचपन से डराया जाता है। आज जब आप स्कूल में पहुंचते हैं तो गुड मॉर्निंग सर और गुड मॉर्निंग मैम बोलते हैं। ये भारत की दोनों महिलाओं का संघर्ष है।
9 जनवरी 1831 में फातिमा से पैदा हुई फातिमा से की पैदाइश महाराष्ट्र के पुणे में हुई।आपको बताते चले कि आधुनिक भारत की ओ पहली मुस्लिम शिक्षिका थी। ये बताते हुए मुझे फक्र हो रहा है कि वो एक ऐसी महिला थी जिन्होंने न सिर्फ खुद शिक्षा में क्रांति लाने की कोशिश की बल्कि उन्होंने दूसरों की मदद की, आप सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा फुले ज्योतिबा फुले का नाम जानते जरूर सुने चुके होंगे। ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फुले एक बार सोचा कि दलितो को खासकर महिलाओं को इल्म देने का काम करेंगे,एजुकेशन देने का काम करेंगे । उन्होंने जब बच्चों को पढ़ना शुरू किया तब हालत ये हो गए कि सावित्रीबाई फुले के जो ससुर थे, गोविंदराव जो ज्योतिबा फुले के फादर हुए गोविंदराव उन्हें इस बात से काफी आपत्ति हुई।उन्होंने अपने बेटे और बहू दोनों को घर से निकाल दिया, तो ऐसे में ये लोग उस्मान शेख के पास पहुंचे।
उस्मान शेख और ज्योतिबा फुले दोनों एक दोस्त जैसा संबंध था। जब वो यहां पहुंचे तो उस्मान शेख अपनी बहन फातिमा से की मुलाकात करवाते हैं । फातिमा शेख अपने घर में इन लोगों को पनाह देती हैं साथ ही साथ आपको पता है कि न सिर्फ पनाह देती हैं बल्कि अपने घर की जमीन स्कूल बनाने के लिए सावित्रीबाई फुले को दे देती है, और पहले स्कूल का निर्माण इसी तरीके से पहले गर्ल्स स्कूल का निर्माण जो फातिमा से करवाती है और सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले पढ़ने का सिलसिला शुरू करते हैं। एक बार 1856 के आस पास की बात है कि ज्योतिबा फुले अकेले पड़ जाते हैं उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले उनकी तबीयत खराब पड़ जाती है । तबीयत खराब होने की वजह से वह घर चली जाती है, तो इस दरमियान स्कूल कैसे चलेगा, तो बताते हैं उस दरमियान स्कूल कैसे चलेगा ? तो बताते हैं कि उसे वक्त सावित्रीबाई फुले की जगह फातिमा शेख एक शिक्षिका का काम करती हैं, और उन बच्चों को पढ़ती, तालीम देती है। उन शिक्षिका को आज हमने भुला दिया है हमारा इतिहास जो उसे भूल चुका है, लेकिन हमारी ये जिम्मेदारी बनती है कि हम ये बात आप तक पहुंचाएं, आपकी ये जिम्मेदारी बनती है कि आप आने वाली नस्लों को ये बात बताएं।
जिस वक्त हिंदू मुस्लिम को आपस में लड़ाया जा रहा है, आज से लगभग 150 साल पहले एक हिंदू और मुसलमान जो मिलकर काम किया वो वाकई बेमिसाल था।
आप सोचिए एक तरफ फातिमा थी तो दूसरी तरफ सावित्रीबाई फुले थी दोनों ने मिलकर जब सावित्रीबाई फुले को जब उनके घर से निकाल दिया तो फातिमा ने पनाह दिया। अपनी जमीन दी और दोनों ने मिलकर स्कूल खोला स्कूल में बच्चों को पढ़ाया इल्म दी तालीम दी और आज महिलाएं बेटियां पढ़ पा रही हैं, उनका पहला स्कूल इन लोगों ने खोला था । हमें जरूरत है फातिमा शेख को याद करने की, हमको जरूरत है उनके बारे में लोगों को बताने की, कि दूसरे कोम की बेटी ने एक दूसरे कोम की बेटी को जगह दिया, और उसके बाद दोनों ने मिलकर एजुकेशन के फील्ड में एक बड़ा काम किया आज आधुनिक भारत में भारत के प्रथम शिक्षिका के रूप में सावित्रीबाई फुले जानते हैं तो वहीं पर भारत के प्रथम मुस्लिम शिक्षिका फातिमा शेख को भी जाना जाता है । सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 महाराष्ट्र के सातारा जिला में हुआ था।
सैकड़ों लोगों की उपस्थिति रही जिसमें बच्चे, युवा महिलाएं तथा पुरूष लोग भी रहे।












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