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पहली बार माता रमाबाई अंबेडकर की 128 वीं जयंती समारोह हुआ आयोजित,भारत में महिलाएं माता रमाबाई अंबेडकर जी के त्याग संघर्ष को भुला चुकी हैं- गीता पैट्रिक

हापुड़ । पहली बार माता रमाबाई अंबेडकर की 128 वीं जयंती समारोह ग्राम शाहपुर जटट जिला हापुड़ उत्तर प्रदेश में कार्यक्रम आयोजित किया गया। महिला जागृति फाउंडेशन द्वारा
मंच पर उपस्थित सभी वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
महिला जागृति फाउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्षा गीता पैट्रिक जी ने अपने संबोधन में कहा कि आधुनि भारत में महिलाएं माता रमाबाई अंबेडकर जी के त्याग संघर्ष को भुला चुकी हैं महिलाओं को यूं ही अधिकार नहीं मिले हैं महिलाओं को मान सम्मान स्वाभिमान की जिंदगी यूं ही नहीं मिली है। बात उस समय की है जब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर पीड़ित दलित बहुजन और सर्व समाज के मसीहा जब विदेश से अपने लोगों के हक अधिकार मांग कर बहुत सारी डिग्रियां प्राप्त करके वापस भारत लौटे तो बाबा साहब की जगह-जगह स्वागत समारोह किया जा रहा था। तो माता रमाबाई के दिल में भी एक जिज्ञासा पैदा हुई की साहब का जो सम्मान स्वागत समारोह है मैं भी उनका सम्मान देखने जाऊंगी और एक दिन बाबा साहब से उन्होंने बोल दिया कि साहब मैं भी आपके साथ स्वागत समारोह में जाना चाहती हूं। तो बाबा साहब ने उनको मना कर दिया। लेकिन माता रमाबाई अंबेडकर जी ने सुना कि बहुत नजदीक स्वागत समारोह है तो उन्होंने बाबा साहब की पगड़ी रखी हुई थी अलमारी में।
रखी हुई पगड़ी को वह साड़ी पहन कर साहब के स्वाग समारोह में चुपचाप दूर खड़ी हो कर देख रही थीं लेकिन बाबा साहब ने अपनी रामु को देख लिया था। माता रमाबाई अंबेडकर जी के आंखों में आंसू थे।
रमाबाई अंबेडकर जी पहले ही घर पर आ गई थी। जब साहब वापस आए तो माता रमाबाई बोली आपका प्रोग्राम कैसा रहा तो साहब ने बताया कि रामु मैं तुम्हें देख लिया था। लेकिन तुम भी अपने आप को कोशती होगी मैं कैसा व्यक्ति हूं तुम घर में शादी होकर आई हो जो मुझे अच्छी साड़ी लेकर भी नहीं पहन सकते तो माता रमाबाई अंबेडकर ने कहा कि नहीं साहब आप जो कर रहे हैं वह एक समाज के लिए कर रहे हैं आप जो कर रहे हैं वह दबे, कुचले, शोषित, वंचित, पीड़ित लोगों के लिए कर रहे हैं तो मैं साड़ी पहनू या नहीं, लेकिन आने वाली तमाम महिलाएं आने वाली करोड़ महिलाएं सम्मान के साथ जिंदगी जी सकेंगी, ऐसा मैं समझती हूं आपके त्याग आपके समर्पण आपका बलिदान ने उन सब लोगों को वह सारी चीज दी है जो मुझे नहीं मिल पाई।
मैं अपने आप को महसूस करूंगी कि वाकई में जो सारी चीज मुझे नहीं मिल रही है वह मेरी आने वाली बच्चिया पहन रही है आने वाले देश में रहने वाली तमाम जो करोड़ों शोषित वंचित पीड़ित लोगों के घर में महिलाएं हैं देश में रहने वाली तमाम समूची महिलाएं हैं वह सब पहन रही है तो मैं तो अपने आप को बहुत खुश नसीब मानती हूं साहब की मैं आपके घर में हूं मैं आपकी जीवन साथी हूं अब आप क्या सोच रहे हैं आज देश में महिलाओं को इतनी सारी चीज मिल पा रही है इसमें त्याग था, माता रमाबाई अंबेडकर का क्योंकि माता रमाबाई अंबेडकर चाहती तो वह डिमांड कर सकती थी कि मुझे भी एक अच्छे से घर में रहना है, वह चाहती तो वह भी डिमांड कर सकती थी कि मेरे बच्चों को पहले आप सारी चीजों की व्यवस्था करके दीजिए। लेकिन माता रमाबाई ने नहीं कहा वह कहावत आपने सुनी होगी कि एक कामयाब व्यक्ति के पीछे एक औरत का हाथ होता है तो बाबा साहब की कामयाबी के पीछे माता रमाबाई उनके जीवनसाथी का हाथ था। क्योंकि शायद अगर वह साथ ना देती तो बाबा साहब टूट जाते हैं जितनी कठिनाई बाबा साहब के बीच आई उन कठिनाइयों में उनका हिस्सेदारी बनाकर माता रमाबाई अंबेडकर खड़ी रही यह बातें सुनने में बहुत छोटी हैं।
हम आप तक पहुंचाते हैं लेकिन जो चीज वाकई हुई होगी आप सोचिए ? कितना पीड़ा दायक होगा। वह बाबा साहब एक साड़ी की व्यवस्था नहीं कर पाए अपनी धर्मपत्नी के लिए साथियों लेकिन आज हम लोगों को वह सारी चीज मिल चुकी है देश में रहने वाली तमाम जितनी भी करोड़ों महिलाएं हैं सबसे कहना चाहूंगी कि आपको इतना सम्मान की जिंदगी मिली है, उसके लिए माता रमाबाई अंबेडकर ने त्याग, समर्पण, बलिदान दिया है अपनी ऐसो आराम को ठुकराया है। जब आपको सारी चीज मिली है लेकिन आज कमाल की बात है कि हम लोग उनका एहसान भूल रहे हैं। उनके बलिदान को गलत बताते हैं, उनके लिखे हुए संविधान को भी गलत बताते हैं, देश के सभी समाज से कहना चाहूंगी और खासकर बहुजन समाज से कहना चाहूंगी आप लोग आज समझ जाइए की किस तरीके से यह जीवन मिला, किस तरीके से यह मान सम्मान स्वाभिमान की जिंदगी मिली, महिलाओं से कहना चाहूंगी की माता रमाबाई अंबेडकर त्याग नहीं करी होती तो अच्छी-अच्छी चीजों की डिमांड करती है तो बाबा साहब वह सारी चीज नहीं कर पाते हैं जिन्होंने आज की बाबा साहब बहुत अच्छा संविधान नहीं लिख पाए वह पहले तो बहुत अच्छी पढ़ाई नहीं कर पाते अगर आज रमाबाई का त्याग समर्पण नहीं होता लोगों के घरों का काम करती थी बाबा साहब विदेश में पढ़ते थे हालत इतनी बुरी थी प्रताड़ना सहनी पड़ती थी। बच्चों की तबीयत खराब रहती थी लेकिन उसके बावजूद भी बाबा साहब को परेशान नहीं किया बाबा साहब की पढ़ाई में वह अड़चन नहीं बनी तो आप लोग उस त्याग,समर्पण और बलिदान को याद रखिए भूलिए मत इस कहानी को आप सभी तक पहुंचाने का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि हम लोग ना भूले वह तमाम त्याग समर्पण बलिदान जो हमारे लोगों के लिए बाबा साहब ने उनके परिवार ने किया है बाबा साहब ने हमारे लिए अपने चार बच्चों को कुर्बान कर दिया लेकिन आज मैं गर्व से कहती हूं कि हां मैं भी बाबा साहेब की वंशज हूं क्योंकि बाबा साहब नहीं होते तो आज मुझे भी मान सम्मान स्वाभिमान की जिंदगी नसीब नहीं होती आप लोग मत बोलिए जो एहसान बाबा साहेब का है माता रमाबाई का महिलाओं के ऊपर जो एहसान है समूचे भारत के ऊपर जो एहसान है हम उसको नहीं भूल सकते हैं सकते हैं लेकिन अगर किसी से हमने कर्ज लिया है जिसको हम चुका नहीं सकते कभी भी याद रखिए कभी नहीं चुका सकते हैं लेकिन थोड़ा सा ब्याज तो चुका सकते हैं हल्का-फुल्का काम करके उनके सपनों का हिस्सेदार तो बन सकते हैं जो उन्होंने सपना देखा उन्होंने सपना देखा इस देश की सत्ता को हासिल करने का उन्होंने सपना देखा कि मेरा समाज भी बहुत अच्छी व्यवस्था में रह सके मेरा समाज भी बहुत अच्छी तरीके से अपने जीवन को व्यतीत करें बहुत अच्छे से स्कूलों में उनके बच्चे पढ़े, बहुत अच्छे कपड़े पहने लेकिन यह कब होगा हमारे आने वाली पीढ़ी को नसीब नहीं होगा अगर आज हम संघर्ष नहीं करेंगे तो मैं आशा उम्मीद करती हूं कि आप मेरी बातों को समझ कर इसको और आगे तक पहुंचाएंगे।
सभा में सैकड़ों लोग उपस्थित लड़के, लड़कियां, महिला पुरुष तथा समस्त ग्राम वासियों रहे।



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