1857 के शहीदों की याद में एक माह तक लगनें वाला देश का पहला शहीद मेला का हुआ शुभारंभ , हापुड़ शहर की हवाओं में तैरती हैं 1857 की लाखों कहानियां

1857 के शहीदों की याद में एक माह तक लगनें वाला देश का पहला शहीद मेला का हुआ शुभारंभ , हापुड़ शहर की हवाओं में तैरती हैं 1857 की लाखों कहानियां
यथार्थ अग्रवाल
हापुड़।
10 मई 1857 में आजादी की लड़ाई में अपनी जान न्योछावर करने वाले क्रांतिकारियों की याद में एक माह तक लगनें वाला एक मात्र शहीद मेला 10 मई से हापुड़ में शुरू होगा। जिसका शुभारंभ सदर विधायक करेंगे। यह मेला हर साल 10 मई को शुरू होकर एक महीने तक चलता है।
जिस धरती ने आजादी की जंग में अपना खून बहाया उन शहीदों को याद करने के लिए हापुड़ में हर साल मेले का आयोजन किया जाता है। परंतु जिन्होंने देश को आजादी दिलाई उनके नाम पर लगने वाले मेले को शासन स्तर से कोई अनुदान नहीं मिलता है। उद्घाटन के समय केवल आश्वासन पर एक साल के लिए कुर्बानी बार बार छिप जाती है।
हापुड़ शहर की हवाओं में तैरती हैं 1857 की लाखों कहानियां
मेरठ से शुरू हुई 1857 की इस क्रांति में शहर हापुड़ का जिक्र करना बेहद जरूरी है, क्योंकि इस क्रांति में हापुड से ग्रामीणों ने बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों का साथ दिया था। इस शहर पर एक नजर डालें तो यूपी के इस शहर का नाम हापुड़ ‘हापर’ शब्द से बना है जिसका मतलब बगीचा होता है। इस शहर की हवाओं में घूमती 1857 की लाखों कहानियां यहाँ के वीर शहीदों, क्रांतिकारियों और देशभक्ति से लबालब लोगों की याद दिलाती हैं जिन्होंने 1857 की क्रांति में अपने प्राणों की आहुति दी थी।
मेले संस्थापक स्वर्गीय कैलाश चंद आजाद के बेटे आशुतोष आजाद ने बताया कि उनके पिता ने 1975 में यहां छोटा सा पौधा रोपा था, जो अब बटवृक्ष है। यह देश में लगने वाला एकमात्र शहीद मेला है। स्वाधीनता संग्राम शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष ललित ने बताया कि पूरी भव्यता के साथ शहीद मेला लगाया जाएगा। यह मेला देशवासियों को शहीदों के संघर्ष और बलिदान को याद दिलाकर प्रेरणा देता है।
आशुतोष आजाद ने बताया जाता है कि मेरठ के कालीपलटन मंदिर से 10 मई 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई गई। इस दौरान महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, भगत सिंह, सुभाष चंद बोस समेत कई क्रांतिकारी आजादी का बिगुल फूंक रहे थे। उस समय हापुड़ क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा था, यहां अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए छुपकर रणनीति बनाई जाती थी। अंग्रेजों ने विद्रोह करने के कारण हापुड़ के 26 गांवों के गुर्जरों और अन्य लोगों के पैरों में कील गाढ़कर जिंदा जला दिया था। वहीं, कुछ क्रांतिकारियों को पेड़ों से बांधकर गोली से उड़ा दिया था, जिन पेड़ों पर उन्हें फांसी दी गई, आज वही उनकी शहादत की याद दिलाते हैं। उन्हीं की याद में 1975 में स्वतंत्रता सैनानी रहे आचार्य कैलाश आजाद ने देश के पहले शहीद मेले का शुभारंभ किया था।
गांव धौलाना के 14 वीरों ने दी थी शहादत
मेरठ से शुरू हुई क्रांति तेजी से देश के कोने-कोने में फैल रही थी, क्रांति में देहात क्षेत्रों से बड़ी संख्या में क्रांतिकारी भाग ले रहे थे। इसी बीच अंग्रेजों ने हापुड़ रामलीला मैदान के बाहर मौजूद पीपल के पेड़ पर धौलाना के चार देशभक्तों को फांसी पर लटका दिया। आज भी यह पीपल का पेड़ शहीदों की शहादत का साक्षी बना हुआ है और हर किसी को रह रहकर शहीदों की याद दिलाता है। लेकिन इस घटना के बाद यह क्रांति की आग गांव में इस तरह से फैली कि एक के बाद एक गांव के चौदह देशभक्तों को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। जिसमें गांव धौलाना के झनकूमल सिंह, बजीर सिंह चौहान, साहाब सिंह गहलौत, सुमेर सिंह गहलौत, किड्डा सिंह गहलौत, चंदन सिंह गहलौत, मख्खन सिंह गहलौत, जिया सिंह गहलौत, दौलत सिंह गहलौत, जीराज सिंह गहलौत, दुर्गा सिंह गहलौत, भसाहब सिंह गहलौत, दलेल सिंह गहलौत, महाराज सिंह गहलौत के नाम शामिल हैं। इस गांव में बना शहीदों का स्मारक आज भी गांव के वीर शहीदों गौरव गाथा का बखान करता है, साथ ही यहा हर वर्ष 23 मार्च का दिन शहीदी दिवस के रुप में मनाया जाता है।
हापुड़ में लगता है देश का अनूठा शहीद मेला
हापुड़ नगर के रामलीला मैदान में लगने वाले शहीद मेले में लगने वाली प्रदर्शनी, देशभक्ति कब्बाली, मुशायरा आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम लोगों के मन में 1857 की क्रांति की याद दिलाते हुए देशभक्ति का भाव पैदा करते हैं। शिव नारायण जौहरी की एक कविता की कुछ पंक्तियां अपने आप में काफी कुछ कहती हैं-
वृद्ध, युवा, महिलाओं में आयी नई जवानी थी।
आजादी के परवानों ने मर मिटने की ठानी थी,
सत्तावन के युद्ध खून से लिखी गयी कहानी थी।
शहीदों के मेले की अनदेखी—
देश में शहीदों का नाम पर हापुड़ में एक माह तक लगने वाले मेले को लेकर जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी तंत्र की अनदेखी के चलते आज तक कोई शासन से अनुदान नहीं मिल पाया है। परंतु शासकीय उपेक्षाओं के चलते नौचंदी की तरह लगने वाला मेला आज तक नौचंदी की तर्ज पर नहीं लग पाया है।
1857 से लेकर 1947 तक आजादी के लिए जंग करने वाले हापुड़ की धरती आज अपने शहीदों का अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। क्योंकि कई स्थान ऐसे है जो कभी आजादी की लड़ाई में प्रसिद्ध रहे थे। केवल स्तंभ पर नाम लिखकर और रामलीला ग्राउंड के बाहर आजादी के समय का खड़ा पेड़ उन वीर शहीदों की यादों को संजोए हुए हैं।
अतिक्रमण में घिर गए स्मारक–
जिन बेटों ने कुर्बानी दी उनकी याद संजोए खड़े स्मारक पर कोई ध्यान नहीं हैा। रामलीला ग्राउंड के बाहर स्मारक के चारों ओर ठेले खड़े कर लिए जाते हैं।











