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कवि प्रेम निर्मल द्वारा संपादित काव्य संकलन “ऑपरेशन सिंदूर” का हुआ विमोचन

हापुड़।
रेलवे रोड स्थित आर. के. प्लाज़ा का वातावरण रविवार को देशभक्ति और साहित्यिक ओज से आलोकित हो उठा, जब हिंदी साहित्य परिषद के तत्वावधान में कवि प्रेम निर्मल द्वारा संपादित काव्य संकलन “ऑपरेशन सिंदूर” का हर्षोल्लासपूर्वक विमोचन किया गया।

समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद् योगेन्द्र कुमार मुन्नू ने की तथा संचालन अपने ओजस्वी और भावपूर्ण शैली में डॉ. अनिल बाजपेई ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ — यह दीप केवल ज्योति नहीं था, बल्कि राष्ट्र प्रेम, कर्तव्य और संस्कृति की अग्निशिखा का प्रतीक बना। दीप प्रज्वलन करने वालों में योगेन्द्र कुमार मुन्नू, विजय कुमार गोयल, विजेंद्र गर्ग लोहे वाले, ललित कुमार अग्रवाल (छावनी वाले), राम आसरे गोयल, महावीर वर्मा ‘मधुर’, कवि प्रेम निर्मल, डॉ. अनिल बाजपेई, अजय मंगल सर्राफ, प्रभात अग्रवाल, जैसे विशिष्ट साहित्य-प्रेमी सम्मिलित हुए।

इस अवसर पर वरिष्ठ शिक्षाविद् विजय कुमार गोयल को “राष्ट्र गौरव सम्मान” से विभूषित किया गया। साथ ही 11 अगस्त 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके परिजनों को सम्मानित किया गया।
विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी चौधरी रघुवीर नारायण त्यागी के सुपौत्र को भी शाल ओढ़ाकर नमन किया गया — यह क्षण जैसे इतिहास की आत्मा से संवाद था।

काव्यपाठ सत्र में कवियों ने ऑपरेशन सिंदूर के भाव से ओतप्रोत रचनाओं का प्रस्तुतीकरण किया, जिनमें देशभक्ति, शौर्य और सत्य के लिए समर्पण की दिव्य भावना प्रवाहित हुई।



कवि प्रेम निर्मल ने कहा —
“प्रबल प्रतापी देशभक्त ये सैनिक हिन्दुस्तान के,
इन्हें देखना दम है कितना, पाँवों में तूफ़ान के।”



डॉ. अनिल बाजपेई ने अपने ओजस्वी शब्दों से जनमानस में जोश भरा —
“घर में घुसकर पाक का, जा तोड़ा अभिमान,
ऑपरेशन सिंदूर का सफल हुआ अभियान।”



राम आसरे गोयल ने कहा —
“अरे पाक तू कैसा पाक, एक नपुंसक तू नापाक।”



महावीर वर्मा ‘मधुर’ ने स्वर उठाया —
“जो भारत की बेटी के सिंदूर पर हाथ लगाएगा,
ऑपरेशन सिंदूर से उसका दर्प मिटाया जाएगा।”



अशोक गोयल ने अपने शब्दों में कहा —
“आज नपुंसक लोगों ने फिर निर्दोषों को मारा है।”



डॉ.आराधना बाजपेई ने अपने अध्यात्म-सिक्त भावों से वातावरण को आलोकित किया —
“मन के दीप जलाइए, ढूंढे सच की राह,
भले गिरे गहरा तिमिर, क्या उसकी परवाह।”



वर्षा जैन ने कहा —
“कश्मीर ये हमारा, है स्वर्ग का नज़ारा,
हमने धरा पे जिसको, आकाश से उतारा।”

गरिमा आर्य की काव्य प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम के भावपूर्ण क्षण में राम आसरे गोयल ने अपनी स्वर्गीय पत्नी सुषमा जी की स्मृति में कवयित्री वर्षा जैन को सम्मानित किया — यह क्षण प्रेम, स्मृति और समर्पण का अद्भुत संगम था।

अन्य रचनाकारों में शिव प्रकाश शर्मा, मोहनलाल तेजयान, पूनम अग्रवाल, शहवार नावेद और वर्षा जैन ने भी अपने भावपूर्ण काव्यपाठ से सबका मन जीत लिया।

यह आयोजन केवल एक विमोचन नहीं था, बल्कि राष्ट्र चेतना, साहित्यिक ऊर्जा और आध्यात्मिक उत्कर्ष का जीवंत प्रतीक बना — जहाँ शब्दों ने संकल्प लिया कि “भारत की संस्कृति और स्वाभिमान की यह ज्योति सदा प्रज्वलित रहे।”



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