महिला जागृति फाउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने झुग्गी झोपड़ी में पहुंच खानाबदोश परिवारों से मिली, सदियों से हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहे हैं खानाबदोश – गीता पैट्रिक

महिला जागृति फाउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने झुग्गी झोपड़ी में पहुंच खानाबदोश परिवारों से मिली, सदियों से हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहे हैं खानाबदोश – गीता पैट्रिक
हापुड़। महिला जागृति फाउंडेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष गीता पैट्रिक हापुड़ की झुग्गी झोपड़ी में पहुंच खानाबदोश परिवारों से वार्ता की और उनकी समस्याओं को जाना तथा समाधान का आश्वासन दिया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष गीता ने कहा कि
खानाबदोश हमारे समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हुए भी अक्सर अनदेखा रह जाता है — घुमंतू जातियाँ।
घुमंतू जातियाँ, जिन्हें हम खानाबदोश भी कहते हैं, सदियों से हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रही हैं। ये लोग एक जगह स्थायी रूप से नहीं रहते, बल्कि अपनी जीविका के लिए स्थान-स्थान पर घूमते रहते हैं। इनके पास न तो पक्के घर होते हैं, न स्थायी रोजगार, और न ही वह सुविधाएँ जो एक सामान्य नागरिक को मिलती हैं।
उन्होंने कहा कि
जहाँ हम अपने घरों में सुरक्षित रहते हैं, वहीं ये लोग खुले आसमान के नीचे जीवन जीते हैं।जहाँ हमारे बच्चों को स्कूल जाने का अधिकार है, वहीं इनके बच्चों का बचपन अक्सर मजदूरी में बीत जाता है।
आज भी घुमंतू समाज के लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पहचान जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। कई बार इनके पास पहचान पत्र तक नहीं होते, जिससे ये सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते।
उन्होंने कहा कि क्या ये लोग हमारे समाज का हिस्सा नहीं हैं?
क्या इन्हें सम्मान और अधिकार नहीं मिलना चाहिए?
हमें यह समझना होगा कि घुमंतू जातियाँ कोई समस्या नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति की जीवंत पहचान हैं। इनके पास अपने पारंपरिक हुनर, कला, संगीत और जीवन जीने का अनोखा तरीका है, जिसे हमें सहेजने की जरूरत है।
सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि इन्हें स्थायी पहचान दी जाए इनके बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जाए।
रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएँ
और सबसे जरूरी, इन्हें सम्मान के साथ समाज में स्थान मिले। जब तक समाज का हर वर्ग आगे नहीं बढ़ेगा, तब तक देश की असली प्रगति संभव नहीं है।












